बूढ़ी होती आबादी की समस्या विकसित देशों में ज़्यादा बड़ी है. वहां कई
वजहों से जन्म दर कम रहती है. ये कारण मुख्यतः आर्थिक समृद्धि से जुड़े
हैं.
इन देशों में बाल मृत्यु-दर कम है. जन्म नियंत्रण आसानी से संभव होता है और बच्चों की परवरिश महंगी है.
इन देशों में महिलाएं अक्सर जीवन के बाद के हिस्से में बच्चे पैदा करती हैं, इसलिए उनकी संख्या कम होती है.
जीवन स्तर बेहतर होने से इन देशों में लोग लंबे समय तक जीवित रहते हैं.
जापान एक प्रमुख उदाहरण है, जहां बच्चे के जन्म के समय उसकी जीवन प्रत्याशा लगभग 84 साल की है (दुनिया में सबसे ज़्यादा).
2018 में जापान की कुल आबादी में 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों का हिस्सा 27 फीसदी था. यह भी दुनिया में सबसे ज़्यादा है.
यूएन के मुताबिक यहां की आबादी में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का हिस्सा सिर्फ़ 3.85 फीसदी है.
इस दोहरी चुनौती ने पिछले कई दशकों से जापान के अधिकारियों को चिंता में डाल रखा है. पिछले साल सरकार ने रिटायरमेंट की उम्र 65 साल से बढ़ाकर 70 साल कर दी थी.
रिटायरमेंट का नया नियम जब लागू होगा तो जापान में रिटायर होने की उम्र दुनिया में सबसे ज़्यादा होगी.
असंतुलित आबादी विकासशील देशों के लिए भी ख़तरा है. चीन की आबादी में जापान के मुक़ाबले 65 साल से ज़्यादा उम्र के बुजुर्गों का हिस्सा कम (10.6 फीसदी) है.
लेकिन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में 1970 के दशक में लागू किए आबादी नियंत्रण उपायों के कारण प्रजनन दर अपेक्षाकृत बहुत कम है (प्रति महिला सिर्फ़ 1.6).
चीन की आबादी में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का हिस्सा 6 फीसदी से भी कम है.
बच्चों की संख्या बनाम जीवन की गुणवत्ता
ऊंची प्रजनन दर के मामले में अफ्रीकी देश अव्वल हैं. मिसाल के लिए, नाइजर दुनिया का सबसे "उर्वर" देश है. 2017 में यहां महिलाओं की औसत प्रजनन दर 7.2 थी.
लेकिन इन देशों में बच्चों की मृत्यु दर भी ऊंची है. नाइजर में हर 1,000 जन्म पर 85 बच्चों की मौत हो जाती है.
आबादी के मामले में 2.1 जादुई नंबर है. जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का मानना है कि यह वह प्रजनन दर है, जिस पर आबादी स्थिर रहती है. जितने बुजुर्गों की मृत्यु होती है, उतने ही बच्चे जन्म ले लेते हैं.
संयुक्त राष्ट्र के सबसे ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के आधे देशों (113) में ही इस दर से बच्चे पैदा हो रहे हैं.
शोधकर्ता यह भी बताते हैं कि जिन देशों में शिशुओं की मृत्यु दर ऊंची है और जीवन प्रत्याशा कम है, वहां 2.3 प्रजनन दर जरूरी होती है. फिलहाल केवल 99 देश इस आंकड़े को छू पा रहे हैं.
दुनिया की कुल आबादी बढ़ रही है. 2024 में वैश्विक आबादी 8 अरब हो सकती है. लेकिन घटती जन्म दर के कारण कई देशों में आबादी गिरने की संभावना है.
चरम स्थिति वाले देशों में एक देश रूस है. यहां की महिलाओं की औसत प्रजनन दर 1.75 है. आने वाले कुछ दशकों में रूस की आबादी में भारी गिरावट होने की आशंका है.
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या प्रभाग ने हिसाब लगाया है कि रूस की आबादी फिलहाल के 14.3 करोड़ से घटकर 2050 में 13.2 करोड़ हो जाएगी.
आबादी घटने और बूढ़ों की संख्या बढ़ने का मतलब होगा काम करने वाले लोगों की संख्या घट जाना. इससे आर्थिक उत्पादकता घट सकती है और विकास बाधित हो सकता है.
पिछले नवंबर में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी थी कि बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के कारण अगले 40 साल में जापान की अर्थव्यवस्था 25 फीसदी तक सिकुड़ सकती है.
ऑक्सफोर्ड इंस्टीट्यूट ऑफ़ पॉपुलेशन एजिंग के डायरेक्टर जॉर्ज लीसन कहते हैं, "जनसांख्यिकी हमारे जीवन के हर पहलू पर असर डालती है. आप बस अपनी खिड़की से बाहर गली में, सड़क पर झांककर देखिए, लोगों के उपभोग को देखिए. सब कुछ जनसांख्यिकी से प्रेरित है."
क्या तकनीक बूढ़ी होती आबादी के आर्थिक प्रभावों को कम करने में मददगार होगी?
इन देशों में बाल मृत्यु-दर कम है. जन्म नियंत्रण आसानी से संभव होता है और बच्चों की परवरिश महंगी है.
इन देशों में महिलाएं अक्सर जीवन के बाद के हिस्से में बच्चे पैदा करती हैं, इसलिए उनकी संख्या कम होती है.
जीवन स्तर बेहतर होने से इन देशों में लोग लंबे समय तक जीवित रहते हैं.
जापान एक प्रमुख उदाहरण है, जहां बच्चे के जन्म के समय उसकी जीवन प्रत्याशा लगभग 84 साल की है (दुनिया में सबसे ज़्यादा).
2018 में जापान की कुल आबादी में 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों का हिस्सा 27 फीसदी था. यह भी दुनिया में सबसे ज़्यादा है.
यूएन के मुताबिक यहां की आबादी में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का हिस्सा सिर्फ़ 3.85 फीसदी है.
इस दोहरी चुनौती ने पिछले कई दशकों से जापान के अधिकारियों को चिंता में डाल रखा है. पिछले साल सरकार ने रिटायरमेंट की उम्र 65 साल से बढ़ाकर 70 साल कर दी थी.
रिटायरमेंट का नया नियम जब लागू होगा तो जापान में रिटायर होने की उम्र दुनिया में सबसे ज़्यादा होगी.
असंतुलित आबादी विकासशील देशों के लिए भी ख़तरा है. चीन की आबादी में जापान के मुक़ाबले 65 साल से ज़्यादा उम्र के बुजुर्गों का हिस्सा कम (10.6 फीसदी) है.
लेकिन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में 1970 के दशक में लागू किए आबादी नियंत्रण उपायों के कारण प्रजनन दर अपेक्षाकृत बहुत कम है (प्रति महिला सिर्फ़ 1.6).
चीन की आबादी में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का हिस्सा 6 फीसदी से भी कम है.
बच्चों की संख्या बनाम जीवन की गुणवत्ता
ऊंची प्रजनन दर के मामले में अफ्रीकी देश अव्वल हैं. मिसाल के लिए, नाइजर दुनिया का सबसे "उर्वर" देश है. 2017 में यहां महिलाओं की औसत प्रजनन दर 7.2 थी.
लेकिन इन देशों में बच्चों की मृत्यु दर भी ऊंची है. नाइजर में हर 1,000 जन्म पर 85 बच्चों की मौत हो जाती है.
आबादी के मामले में 2.1 जादुई नंबर है. जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का मानना है कि यह वह प्रजनन दर है, जिस पर आबादी स्थिर रहती है. जितने बुजुर्गों की मृत्यु होती है, उतने ही बच्चे जन्म ले लेते हैं.
संयुक्त राष्ट्र के सबसे ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के आधे देशों (113) में ही इस दर से बच्चे पैदा हो रहे हैं.
शोधकर्ता यह भी बताते हैं कि जिन देशों में शिशुओं की मृत्यु दर ऊंची है और जीवन प्रत्याशा कम है, वहां 2.3 प्रजनन दर जरूरी होती है. फिलहाल केवल 99 देश इस आंकड़े को छू पा रहे हैं.
दुनिया की कुल आबादी बढ़ रही है. 2024 में वैश्विक आबादी 8 अरब हो सकती है. लेकिन घटती जन्म दर के कारण कई देशों में आबादी गिरने की संभावना है.
चरम स्थिति वाले देशों में एक देश रूस है. यहां की महिलाओं की औसत प्रजनन दर 1.75 है. आने वाले कुछ दशकों में रूस की आबादी में भारी गिरावट होने की आशंका है.
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या प्रभाग ने हिसाब लगाया है कि रूस की आबादी फिलहाल के 14.3 करोड़ से घटकर 2050 में 13.2 करोड़ हो जाएगी.
आबादी घटने और बूढ़ों की संख्या बढ़ने का मतलब होगा काम करने वाले लोगों की संख्या घट जाना. इससे आर्थिक उत्पादकता घट सकती है और विकास बाधित हो सकता है.
पिछले नवंबर में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी थी कि बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के कारण अगले 40 साल में जापान की अर्थव्यवस्था 25 फीसदी तक सिकुड़ सकती है.
ऑक्सफोर्ड इंस्टीट्यूट ऑफ़ पॉपुलेशन एजिंग के डायरेक्टर जॉर्ज लीसन कहते हैं, "जनसांख्यिकी हमारे जीवन के हर पहलू पर असर डालती है. आप बस अपनी खिड़की से बाहर गली में, सड़क पर झांककर देखिए, लोगों के उपभोग को देखिए. सब कुछ जनसांख्यिकी से प्रेरित है."
क्या तकनीक बूढ़ी होती आबादी के आर्थिक प्रभावों को कम करने में मददगार होगी?
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